अमेरिकी सीनेट का ईरान नीति पर फैसला राष्ट्रपति के लिए बड़ी चेतावनी क्यों है

अमेरिकी सीनेट का ईरान नीति पर फैसला राष्ट्रपति के लिए बड़ी चेतावनी क्यों है

वाशिंगटन के गलियारों में अचानक हलचल बढ़ गई है। राष्ट्रपति ट्रंप की ईरान नीति को लेकर अमेरिकी संसद में जो हुआ, उसने साफ कर दिया है कि विदेशी जमीन पर बिना सोचे-समझे लिए गए फैसलों को अब खुली छूट नहीं मिलने वाली। अमेरिकी सीनेट ने एक बड़ा कदम उठाते हुए राष्ट्रपति की सैन्य शक्तियों को सीमित करने वाला प्रस्ताव पास कर दिया।

यह कोई मामूली वोटिंग नहीं थी। यह सीधे तौर पर व्हाइट हाउस की मर्जी को चुनौती देने जैसा है। सीनेट में रिपब्लिकन पार्टी का दबदबा होने के बावजूद कुछ सांसदों ने अपनी ही पार्टी के राष्ट्रपति के खिलाफ जाकर वोट किया। इस फैसले ने साबित किया कि जब बात किसी नए युद्ध में कूदने की आती है, तो अमेरिकी संसद अपने संवैधानिक अधिकारों को लेकर कितनी गंभीर हो जाती है।

व्हाइट हाउस की मर्जी पर क्यों लगा ब्रेक

इस प्रस्ताव का मुख्य मकसद राष्ट्रपति को बिना संसद की मंजूरी के ईरान के खिलाफ किसी भी तरह की सीधी जंग शुरू करने से रोकना है। अमेरिकी संविधान के मुताबिक जंग का ऐलान करने का अधिकार सिर्फ संसद के पास है। पिछले कुछ समय में जिस तरह से बिना किसी ठोस चर्चा के फैसले लिए गए, उसने सांसदों के बीच असुरक्षा की भावना पैदा कर दी थी।

विपक्ष का मानना है कि ऐसे कदम अमेरिका को बिना वजह एक बड़े संकट में धकेल सकते हैं। जब से ड्रोन हमलों में ईरान के शीर्ष सैन्य नेतृत्व को निशाना बनाया गया, तब से मध्य पूर्व में तनाव खतरनाक स्तर पर पहुंच चुका है। सीनेट के इस ताजा रुख ने साफ संदेश दिया है कि हर फैसले का हिसाब देना होगा। As highlighted in latest articles by USA Today, the results are worth noting.

संसद बनाम राष्ट्रपति की शक्तियों की असली लड़ाई

यह लड़ाई सिर्फ ईरान नीति तक सीमित नहीं है। यह असल में इस बात का मुकाबला है कि अमेरिका का विदेशी मामलों में असली बॉस कौन है। राष्ट्रपति के समर्थक दलील दे रहे हैं कि ऐसे प्रस्तावों से दुश्मन के सामने अमेरिका कमजोर दिखता है। उनका कहना है कि तुरंत कार्रवाई करने की क्षमता ही देश को सुरक्षित रखती है।

दूसरी तरफ, प्रस्ताव के पैरोकारों का कहना है कि सोच-समझकर लिया गया फैसला कभी कमजोरी नहीं होता। अगर अमेरिकी जवानों की जान जोखिम में डालनी है, तो उसका फैसला किसी एक व्यक्ति के हाथ में नहीं छोड़ सकते। चार रिपब्लिकन सांसदों का पाला बदलना यह दिखाता है कि यह चिंता कितनी गहरी थी।

इस कदम के जमीनी असर क्या होंगे

जवाब सीधा है। राष्ट्रपति इस प्रस्ताव को वीटो करने की पूरी ताकत रखते हैं। वीटो को पलटने के लिए संसद में दो-तिहाई बहुमत की जरूरत होती है, जो फिलहाल विपक्ष के पास नहीं है। तो क्या यह सब सिर्फ एक राजनीतिक ड्रामा है? बिल्कुल नहीं।

भले ही यह प्रस्ताव तुरंत कानून न बन पाए, लेकिन इसने राष्ट्रपति की आगे की राह बेहद मुश्किल कर दी है। अब व्हाइट हाउस ईरान पर कोई भी बड़ा फैसला लेने से पहले दस बार सोचेगा। उन्हें पता है कि देश की जनता और संसद के भीतर एक बड़ा धड़ा किसी भी नए सैन्य टकराव के सख्त खिलाफ है। इसका सीधा असर अमेरिकी अर्थव्यवस्था और आने वाले चुनावों पर भी पड़ना तय है।

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आगे का रास्ता और रणनीतिक बदलाव

अब आगे क्या होगा? सबसे बड़ा कदम यह होगा कि प्रशासन को अपनी मध्य पूर्व की रणनीति में बदलाव करना पड़ेगा। बिना सोचे-समझे किए गए हमलों की जगह अब कूटनीतिक बातचीत को आगे बढ़ाना ही एकमात्र व्यावहारिक रास्ता बचता है।

सैन्य खर्चों का बोझ अमेरिकी टैक्सपेयर्स पर लगातार बढ़ रहा है। संसद अब बजट के मोर्चे पर भी सख्ती दिखाने के मूड में है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि व्हाइट हाउस इस झटके के बाद अपनी ईरान नीति को कैसे संभालता है।

अब कूटनीतिक मोर्चे पर नई रणनीतियां बनाने की जरूरत है ताकि बिना युद्ध के ही स्थिति को नियंत्रण में रखा जा सके।

JR

John Reed

Drawing on years of industry experience, John Reed provides thoughtful commentary and well-sourced reporting on the issues that shape our world.