कागजी सीज़फायर के बीच सुलगता लेबनान और लेबनानी पीएम नवाफ सलाम का चौंकाने वाला बयान

कागजी सीज़फायर के बीच सुलगता लेबनान और लेबनानी पीएम नवाफ सलाम का चौंकाने वाला बयान

जब दुनिया को लगा कि मध्य पूर्व में शांति की शुरुआत हो चुकी है, तब जमीन पर कुछ और ही खेल चल रहा था। अप्रैल के महीने में अमेरिका ने बड़े जोर-शोर से इज़रायल और लेबनान के बीच सीज़फायर का ऐलान कराया था। लगा कि अब आसमान से बारूद बरसना बंद हो जाएगा। लेकिन सच इसके बिल्कुल उलट निकला। लेबनान के प्रधानमंत्री नवाफ सलाम ने जो आंकड़े जारी किए हैं, वे होश उड़ाने वाले हैं। सीज़फायर सिर्फ एक शब्द बनकर रह गया और जमीनी हकीकत में कोई बदलाव नहीं आया।

लेबनानी पीएम नवाफ सलाम के मुताबिक, सीज़फायर लागू होने के बाद से इज़रायल ने लेबनान पर लगभग 3,500 बार बमबारी की है। ये कोई छोटा-मोटा आंकड़ा नहीं है। यह दिखाता है कि युद्ध विराम के नाम पर केवल राजनीति हो रही थी, जबकि अग्रिम मोर्चे पर बम और मिसाइलें पहले की तरह ही तबाही मचा रही थीं। लेबनान सरकार के इस आधिकारिक बयान ने वैश्विक स्तर पर चल रहे शांति प्रयासों की पोल खोलकर रख दी है।

कागजों पर शांति और जमीन पर तबाही का खौफनाक मंजर

इतिहास गवाह है कि युद्ध विराम का मतलब हथियारों का शांत होना होता है। लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ। अमेरिकी मध्यस्थता में हुआ यह सीज़फायर 17 अप्रैल को आधी रात से लागू हुआ था। नियम के मुताबिक दोनों तरफ से हमले रुकने चाहिए थे, पर इज़रायली सैनिक दक्षिणी लेबनान के अंदर काफी गहराई तक मौजूद रहे। नतीजा यह हुआ कि राजधानी बेरूत और उसके आस-पास के इलाकों में तो बड़े हवाई हमले कुछ हद तक रुक गए, लेकिन दक्षिणी लेबनान जंग का अखाड़ा बना रहा।

पीएम नवाफ सलाम के दफ्तर से जारी आधिकारिक आंकड़ों पर नजर डालें तो 17 अप्रैल से लेकर 7 जून के बीच इज़रायल ने लेबनान की धरती पर कुल 3,491 हवाई हमले किए। बात सिर्फ हवाई हमलों तक सीमित नहीं रही। इस दौरान 407 नियंत्रित विस्फोट यानी कंट्रोल्ड डिमोलिशन भी किए गए। इसके अलावा छह बड़े रेज़िंग ऑपरेशंस चलाए गए, जिनका मकसद इमारतों और बस्तियों को पूरी तरह जमींदोज करना था।

इस आक्रामक सैन्य रणनीति का असर यह हुआ कि दक्षिणी लेबनान के सीमावर्ती इलाकों में मौजूद कई गांव अब पूरी तरह से नक्शे से गायब हो चुके हैं। वहां सिर्फ मलबे के ढेर बचे हैं। इज़रायल का इस पर तर्क है कि वह दक्षिणी लेबनान में सक्रिय हिजबुल्लाह के ठिकानों और बुनियादी ढांचे को नष्ट कर रहा है, और सीज़फायर की शर्तें उसे अपनी सुरक्षा के लिए कार्रवाई करने की इजाजत देती हैं। लेकिन इस पूरी कार्रवाई में आम नागरिकों की जिंदगी पूरी तरह तबाह हो चुकी है।

विस्थापन का नया संकट और चरमराती व्यवस्था

लेबनान पहले से ही गंभीर आर्थिक और राजनीतिक संकट से जूझ रहा है। इस नए युद्ध ने देश की कमर तोड़ दी है। 2 मार्च को युद्ध की शुरुआत होने के बाद से अब तक लेबनान की कुल आबादी का करीब पांचवां हिस्सा यानी 10 लाख से ज्यादा लोग बेघर हो चुके हैं। इज़रायली हमलों और खाली करने की चेतावनियों के डर से लोग अपने घरों को छोड़कर भागने पर मजबूर हुए हैं।

पीएम नवाफ सलाम ने कैबिनेट बैठक के बाद साफ कहा कि ईरान और इज़रायल के बीच हालिया तनाव ने इस संकट को और ज्यादा बढ़ा दिया है। विस्थापन की एक नई लहर आ गई है। जो लोग पहले सुरक्षित इलाकों में शरण लिए हुए थे, उन्हें अब फिर से भागना पड़ रहा है। लेबनान सरकार के पास इन लाखों शरणार्थियों को बुनियादी सुविधाएं जैसे भोजन, पानी और सिर छुपाने की जगह देने के लिए संसाधन ही नहीं बचे हैं।

"हम सीज़फायर का सम्मान करने और इसे बनाए रखने की हर मुमकिन कोशिश कर रहे हैं। लेकिन जब आपके गांवों को लगातार निशाना बनाया जा रहा हो, तो व्यवस्था को संभालना नामुमकिन सा हो जाता है।" — लेबनानी पीएमओ

हिजबुल्लाह का रुख और क्षेत्रीय समीकरण

इस पूरी जंग के पीछे का गणित समझना भी जरूरी है। हिजबुल्लाह ने इस संघर्ष की शुरुआत इज़रायल पर रॉकेट दागकर की थी, जिसे उसने अपने सहयोगी देश ईरान के समर्थन में उठाया कदम बताया था। जब अप्रैल में सीज़फायर हुआ, तब भी हिजबुल्लाह और इज़रायल के बीच की तनातनी खत्म नहीं हुई। हिजबुल्लाह ने अमेरिका की मध्यस्थता में होने वाली किसी भी ऐसी बातचीत को सिरे से खारिज कर दिया, जो इस युद्ध विराम को एक स्थायी समझौते में बदल सकती थी।

हाल ही में स्थिति तब और बिगड़ गई जब इज़रायल ने बेरूत के दक्षिणी उपनगरीय इलाके (दहिया) पर बमबारी की। इज़रायल का कहना था कि यह हिजबुल्लाह द्वारा उत्तरी इज़रायल पर किए गए हमलों का जवाब था। इसके बाद ईरान ने सीधे उत्तरी इज़रायल पर मिसाइलें दाग दीं और जवाब में इज़रायल ने ईरान के भीतर कई ठिकानों को निशाना बनाया। इस त्रिकोणीय संघर्ष ने सीज़फायर के बचे-कुचे वजूद को भी खत्म कर दिया है।

क्या वाकई गंभीर हैं अंतरराष्ट्रीय शांति प्रयास

इस पूरी स्थिति पर अमेरिकी प्रशासन का रवैया भी हैरान करने वाला है। हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बयान में कहा था कि मध्य पूर्व में सीज़फायर का मतलब पूरी तरह से लड़ाई का रुकना नहीं होता, बल्कि इसका मतलब "जरा सलीके से और कम तीव्रता के साथ गोलीबारी करना" होता है। यह बयान साफ करता है कि अंतरराष्ट्रीय शक्तियों के लिए इन समझौतों की अहमियत क्या है। जब महाशक्तियां ही युद्ध विराम को इस नजरिए से देखेंगी, तो जमीन पर शांति की उम्मीद करना बेमानी है।

लेबनान के स्वास्थ्य मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, 2 मार्च से शुरू हुई इस जंग में अब तक 3,613 से ज्यादा लोग अपनी जान गंवा चुके हैं। मरने वालों में एक बड़ी संख्या उन मासूम नागरिकों की है जिनका राजनीति या इस सैन्य संघर्ष से कोई लेना-देना नहीं था।

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जमीनी हकीकत से जुड़े अगले कदम

इस पूरे घटनाक्रम से स्पष्ट है कि केवल कागजों पर समझौते दस्तखत कर देने से युद्ध नहीं रुकते। अगर आप वैश्विक राजनीति और इस क्षेत्र के घटनाक्रमों पर नजर रखते हैं, तो आपको आने वाले दिनों में इन जरूरी पहलुओं पर ध्यान देना चाहिए:

  • संयुक्त राष्ट्र की भूमिका पर नजर रखें: देखें कि क्या संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद लेबनान में सीज़फायर को प्रभावी ढंग से लागू कराने के लिए कोई नया प्रस्ताव या शांति सेना की तैनाती पर विचार करती है।
  • मानवीय सहायता की स्थिति देखें: अंतरराष्ट्रीय रेड क्रॉस और यूएन की संस्थाएं लेबनान के विस्थापितों तक कितनी मदद पहुंचा पा रही हैं, क्योंकि आने वाले दिनों में वहां भुखमरी और स्वास्थ्य संकट गहराने की पूरी आशंका है।
  • ईरान-इज़रायल सीधे टकराव का विश्लेषण करें: लेबनान का भविष्य अब केवल हिजबुल्लाह पर निर्भर नहीं है, बल्कि ईरान और इज़रायल के बीच सीधे मिसाइल युद्ध के नतीजों से तय होगा।

लेबनान इस समय एक ऐसे दोराहे पर खड़ा है जहां सीज़फायर सिर्फ एक कूटनीतिक ढोंग नजर आता है। जब तक जमीनी स्तर पर सेनाएं पीछे नहीं हटतीं और हमलों का सिलसिला पूरी तरह नहीं थमता, तब तक मध्य पूर्व के इस खूबसूरत देश के आसमान से बारूद यूं ही बरसता रहेगा और मासूम लोग इसकी कीमत चुकाते रहेंगे।

MA

Marcus Allen

Marcus Allen combines academic expertise with journalistic flair, crafting stories that resonate with both experts and general readers alike.