होर्मुज जलडमरूमध्य में फंसे ग्यारह हजार नाविकों का असली सच

होर्मुज जलडमरूमध्य में फंसे ग्यारह हजार नाविकों का असली सच

समुद्र के बीचों-बीच सैकड़ों जहाजों पर 11,000 से ज्यादा इंसान पिछले चार महीनों से कैद हैं। यह कोई काल्पनिक फिल्म की कहानी नहीं है। यह आज की कड़वी हकीकत है। पश्चिम एशिया के सबसे संवेदनशील समुद्री रास्ते होर्मुज स्ट्रेट में ये नाविक उस राजनीतिक लड़ाई की कीमत चुका रहे हैं, जिससे उनका कोई लेना-देना नहीं था। राहत की बात बस इतनी है कि संयुक्त राष्ट्र के अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठन (आईएमओ) ने अब इन्हें सुरक्षित निकालने के लिए एक बड़ा रेस्क्यू प्लान तैयार कर लिया है। लेकिन क्या यह काम इतना आसान है। बिल्कुल नहीं।

फरवरी 2026 के आखिरी हफ्ते में जब अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच तनाव युद्ध में बदला, तो ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट की घेराबंदी कर दी। देखते ही देखते दुनिया की इस सबसे व्यस्त तेल सप्लाई लाइन पर पहरा लग गया। व्यापारिक जहाजों के पहिए थम गए। करीब 600 मालवाहक जहाज और तेल टैंकर जहां थे, वहीं ठप हो गए। इन जहाजों पर भारत, बांग्लादेश, फिलीपींस और वियतनाम जैसे देशों के मासूम नाविक सवार थे। महीनों तक ये लोग समुद्र की लहरों के बीच फंसे रहे। अब जाकर अमेरिका और ईरान के बीच एक समझौते पर सहमति बनी है, जिसके बाद संयुक्त राष्ट्र इस विशाल रेस्क्यू ऑपरेशन को जमीन पर उतारने की कोशिश में जुटा है।

समुद्र के बीच नरक जैसी परिस्थितियों का सामना

इन ग्यारह हजार से अधिक इंसानों ने पिछले 120 दिनों में जो झेला है, उसकी कल्पना भी रूह कंपा देती है। जब कोई जहाज समुद्र में महीनों तक एक ही जगह खड़ा रहता है, तो उसकी बुनियादी व्यवस्थाएं चरमरा जाती हैं।

इस्तांबुल के समुद्री विशेषज्ञ यूरुक इसिक ने हालात का विश्लेषण करते हुए बताया कि इन जहाजों पर स्थितियां बेहद अलग और डरावनी हैं। कुछ चालक दल के सदस्य बेहद ऊब चुके हैं लेकिन सुरक्षित हैं, जबकि कई जहाज ऐसे हैं जहाँ मानवीय त्रासदी अपने चरम पर है। जहाजों का डीजल खत्म हो चुका है। डीजल खत्म होने का सीधा मतलब है कि जहाज पर बिजली गुल है। बिना बिजली के रेफ्रिजरेशन सिस्टम बंद हो गए हैं, जिससे महीनों का रखा खाना सड़ चुका है। पीने के पानी की राशनिंग की जा रही है। चिलचिलाती गर्मी में बिना पंखे और एसी के लोहे के इन विशाल जहाजों पर रहना किसी भट्टी में रहने जैसा है।

इस पूरे संकट के दौरान 14 बेकसूर नाविकों ने अपनी जान गंवा दी। आईएमओ के महासचिव आर्सेनियो डोमिंगुएज ने इन मृत नाविकों को श्रद्धांजलि देते हुए स्वीकार किया कि इन बेकसूर समुद्री कामगारों ने वैश्विक व्यापार को चालू रखने के लिए अपनी जान की बाजी लगा दी। नाविकों का मानसिक स्वास्थ्य पूरी तरह टूट चुका है। कई कप्तानों ने गुमनाम रहकर संदेश भेजे हैं कि वे खुद को युद्धबंदी जैसा महसूस कर रहे हैं। हर पल यह डर सताता रहता है कि कब कोई ड्रोन या मिसाइल उनके शांत खड़े जहाज को निशाना बना ले।

संयुक्त राष्ट्र का रेस्क्यू प्लान आखिर है क्या

राहत की खबर यह है कि ईरान और अमेरिका के बीच एक समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर होने के बाद आईएमओ ने एक विस्तृत रेस्क्यू ब्लूप्रिंट तैयार किया है। आर्सेनियो डोमिंगुएज के मुताबिक, सुरक्षा गारंटी मिलने के बाद ही इस ऑपरेशन को हरी झंडी दिखाई गई है।

यह कोई सामान्य रेस्क्यू ऑपरेशन नहीं है जहां हेलीकॉप्टर से लोगों को उठा लिया जाए। यह समुद्र के इतिहास का सबसे जटिल लॉजिस्टिक्स ऑपरेशन होने जा रहा है।

इस प्लान को कई चरणों में लागू किया जाएगा। ओमान के रक्षा मंत्रालय और तटीय देशों के समन्वय से होर्मुज स्ट्रेट के भीतर दो अस्थायी सुरक्षित रूट बनाए जा रहे हैं। इन रूटों के जरिए जहाजों को धीरे-धीरे सुरक्षित पानी की तरफ निकाला जाएगा। सबसे बड़ा खतरा समुद्र में जहाजों के आपस में टकराने का है। चार महीने से ठप पड़े इंजनों और प्रणालियों के कारण जहाजों को अचानक चलाना जोखिम भरा है। इसलिए जहाजों की आवाजाही को बहुत ही नियंत्रित और धीमी गति से प्रबंधित किया जाएगा।

फंसे हुए नाविकों को सुरक्षित उनके वतन भेजने या उनकी जगह नए क्रू मेंबर्स को तैनात करने की प्रक्रिया भी शुरू की जा रही है। डेनमार्क, फ्रांस और ब्रिटेन की नौसैनिक ताकतें भी इस पूरे ऑपरेशन के दौरान सुरक्षा और निगरानी में मदद कर रही हैं ताकि कोई अप्रिय घटना न हो।

टोल टैक्स का नया भू-राजनीतिक विवाद

भले ही नाविकों को निकालने का रास्ता साफ हो गया हो, लेकिन होर्मुज स्ट्रेट के भविष्य पर एक नया विवाद खड़ा हो गया है। ईरान ने इस अंतरराष्ट्रीय जलमार्ग से गुजरने वाले जहाजों से एक विशेष शुल्क या टोल वसूलने का प्रस्ताव रखा है। ईरान का तर्क है कि इस पूरे संकट के दौरान उसने जलमार्ग की सुरक्षा की है, इसलिए वह टैक्स का हकदार है।

इस प्रस्ताव पर अमेरिका ने बेहद कड़ा रुख अपनाया है। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने संयुक्त अरब अमीरात की अपनी यात्रा के दौरान साफ लफ्जों में चेतावनी दी कि होर्मुज स्ट्रेट एक अंतरराष्ट्रीय जलमार्ग है। अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून के मुताबिक, दुनिया का कोई भी देश किसी अंतरराष्ट्रीय जलमार्ग का उपयोग करने के लिए टैक्स या टोल नहीं वसूल सकता। अमेरिका इस तरह के किसी भी प्रयास को अवैध मानता है।

दूसरी तरफ, ईरान के मुख्य वार्ताकार और संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाघर गालिबफ का कहना है कि यह जलमार्ग अब कभी भी युद्ध से पहले वाली स्थिति में नहीं लौटेगा। ईरान इस रास्ते पर अपना रणनीतिक नियंत्रण बनाए रखना चाहता है। इसका सीधा मतलब यह है कि नाविक भले ही निकल जाएं, लेकिन इस रास्ते से गुजरने वाले व्यापारिक जहाजों के लिए खतरा पूरी तरह कभी खत्म नहीं होगा।

वैश्विक अर्थव्यवस्था और सप्लाई चेन पर चोट

होर्मुज स्ट्रेट दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण समुद्री चोकपॉइंट है। दुनिया का लगभग 20 प्रतिशत कच्चा तेल और लिक्विफाइड नेचुरल गैस (एलएनजी) इसी संकरे रास्ते से होकर गुजरता है। ईरान की नाकाबंदी के कारण पिछले चार महीनों में वैश्विक तेल बाजार में भारी उथल-पुथल रही है। उर्वरक और अन्य आवश्यक वस्तुओं की ढुलाई रुकने से कई देशों में खेती-किसानी पर भी संकट आ गया था।

समझौते के बाद पिछले कुछ दिनों में जहाजों की आवाजाही थोड़ी शुरू जरूर हुई है। केप्लर शिपिंग इंटेलिजेंस डेटा के मुताबिक, हाल ही में एक दिन में 36 वाणिज्यिक जहाज इस रास्ते से गुजरे, जो युद्ध शुरू होने के बाद सबसे बड़ी संख्या है। लेकिन यह संख्या युद्ध से पहले के सामान्य दिनों के दैनिक औसत (138 जहाज) के मुकाबले कुछ भी नहीं है। अभी भी 200 से अधिक तेल टैंकर समुद्र में अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं।

समुद्री उद्योग के विशेषज्ञों का मानना है कि स्थिति को पूरी तरह सामान्य होने में कम से कम छह महीने का समय लगेगा। इंटरनेशनल मैरीटाइम एम्प्लॉयर्स काउंसिल के मुख्य कार्यकारी फ्रांसेस्को गार्गियुलो के अनुसार, जहाजों की फिटनेस जांच, नए क्रू की व्यवस्था और बीमा कंपनियों के भरोसे को बहाल करने में लंबा वक्त लगने वाला है।

जमीनी स्तर पर अगले कदम क्या होने चाहिए

इस संकट ने साफ कर दिया है कि वैश्विक महाशक्तियों की लड़ाई में हमेशा उन लोगों को कीमत चुकानी पड़ती है जो अग्रिम मोर्चे पर काम कर रहे हैं। इस रेस्क्यू ऑपरेशन को पूरी तरह सफल बनाने और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए कुछ ठोस कदम तुरंत उठाने होंगे।

शिपिंग कंपनियों को तुरंत अपने फंसे हुए क्रू के परिवारों को वित्तीय और मानसिक सहायता पहुंचानी चाहिए क्योंकि इन नाविकों की कमाई पर ही उनके घरों के चूल्हे जलते हैं। भारत जैसे देशों को, जिनके नाविक बड़ी संख्या में अंतरराष्ट्रीय जहाजों पर काम करते हैं, आईएमओ के इस रेस्क्यू मिशन में अपने रिसोर्सेज और राजनयिक प्रभाव का पूरा इस्तेमाल करना होगा ताकि उनके नागरिकों की सुरक्षित वापसी सबसे पहले हो सके। अंतरराष्ट्रीय समुदाय को होर्मुज स्ट्रेट जैसे संवेदनशील जलमार्गों के लिए एक नया और कड़ा कानूनी ढांचा तैयार करना होगा ताकि भविष्य में कोई भी देश राजनीतिक लाभ के लिए नागरिक जहाजों को बंधक न बना सके।

MA

Marcus Allen

Marcus Allen combines academic expertise with journalistic flair, crafting stories that resonate with both experts and general readers alike.