भारत-न्यूजीलैंड की रणनीतिक साझेदारी चीन की दादागीरी का जवाब क्यों है

भारत-न्यूजीलैंड की रणनीतिक साझेदारी चीन की दादागीरी का जवाब क्यों है

इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में पिछले कुछ सालों से जो चल रहा है, वो किसी से छिपा नहीं है। चीन लगातार दादागीरी दिखा रहा है। छोटे देशों को डरा रहा है। ऐसे माहौल में भारत और न्यूजीलैंड ने एक ऐसा कदम उठाया है जिसने बीजिंग की नींद उड़ा दी है। पूरे 40 साल बाद भारत का कोई प्रधानमंत्री न्यूजीलैंड की धरती पर कदम रखता है और वहां सीधे 18 बड़े समझौते हो जाते हैं। यह केवल सरकारी कागजों का आदान-प्रदान नहीं है। यह एक सीधा संदेश है कि अब दोनों देश मिलकर इस पूरे इलाके में शक्ति का संतुलन बदलने वाले हैं।

अगर आप सोच रहे हैं कि दोनों देशों के बीच अचानक इतना प्यार क्यों उमड़ पड़ा, तो आपको थोड़ा पीछे जाकर देखना होगा। दोनों देश लोकतंत्र हैं। दोनों मुक्त व्यापार चाहते हैं। दोनों को समुद्र में खुली छूट चाहिए। लेकिन चीन ऐसा होने नहीं देना चाहता। बस यही वो वजह है जिसने ऑकलैंड में हुई पीएम नरेंद्र मोदी और क्रिस्टोफर लक्सन की मुलाकात को ऐतिहासिक बना दिया। दोनों देशों ने अपने रिश्तों को सीधे 'रणनीतिक साझेदारी' का दर्जा दे दिया।

इस नई दोस्ती से चीन को क्या दिक्कत है

चीन को लगता है कि इंडो-पैसिफिक उसका अपना तालाब है। वह जब चाहे जहां चाहे अपनी नौसेना भेज देता है। छोटे प्रशांत द्वीपीय देशों को कर्ज के जाल में फंसा लेता है। भारत-न्यूजीलैंड की रणनीतिक साझेदारी इसी चाल को नाकाम करने का मास्टरस्ट्रोक है।

इस साझेदारी का सबसे बड़ा हिस्सा समुद्री सुरक्षा से जुड़ा है। दोनों देशों की नौसेनाओं ने आपसी लॉजिस्टिक्स सहायता पर सहमति जताई है। इसका मतलब क्या है। इसका सीधा मतलब है कि जरूरत पड़ने पर भारतीय युद्धपोत न्यूजीलैंड के बंदरगाहों पर रुक सकेंगे। वहां से ईंधन और रसद ले सकेंगे। ठीक यही काम न्यूजीलैंड की नौसेना भारतीय तटों पर कर पाएगी। BBC News has provided coverage on this critical issue in extensive detail.

यह कोई छोटी बात नहीं है। इससे भारतीय नौसेना की पहुंच प्रशांत महासागर के सुदूर इलाकों तक हो जाएगी। चीन की हरकतों पर नजर रखना अब पहले से कहीं ज्यादा आसान होगा। दोनों देशों ने हाइड्रोग्राफी और समुद्र के नक्शे साझा करने का भी फैसला किया है। समुद्र के नीचे क्या चल रहा है, इसकी सटीक जानकारी अब दोनों के पास होगी। जब दो बड़ी ताकतें इस तरह हाथ मिलाती हैं, तो दादागीरी करने वाले को पीछे हटना ही पड़ता है।

व्यापार का नया गणित और 35 हजार करोड़ का प्लान

सिर्फ हथियारों और जहाजों से रिश्ते मजबूत नहीं होते। पैसा भी बहुत जरूरी है। दोनों देशों ने मिलकर 'रोडमैप 2030' को मंजूरी दी है। इसका लक्ष्य बहुत साफ है। अगले चार साल में द्विपक्षीय व्यापार को दोगुना करके करीब 35 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा पहुंचाना है।

ईमानदारी से कहें तो दोनों देशों के बीच व्यापार हमेशा से उनकी क्षमता से कम रहा है। न्यूजीलैंड की आबादी छोटी है लेकिन उनकी तकनीक और डेयरी उत्पाद लाजवाब हैं। भारत के पास एक बहुत बड़ा बाजार है। फ्री ट्रेड एग्रीमेंट के तहत अब दोनों देश एक-दूसरे के लिए अपने दरवाजे पूरी तरह खोल रहे हैं। इसके साथ ही न्यूजीलैंड ने अगले 15 सालों में भारत के अंदर 20 अरब डॉलर के निवेश का बड़ा वादा किया है। यह पैसा भारत के इंफ्रास्ट्रक्चर और नए उद्योगों में लगेगा।

भारत का डिजिटल पेमेंट सिस्टम यानी UPI भी अब न्यूजीलैंड पहुंचने वाला है। वहां रहने वाले तीन लाख से ज्यादा भारतीय मूल के लोगों के लिए यह बहुत बड़ी राहत होगी। वे बिना किसी झंझट के पलक झपकते ही पैसे ट्रांसफर कर सकेंगे। पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए दोनों देशों के बीच सीधी उड़ानें शुरू करने की तैयारी भी अंतिम चरण में है। अभी भारत से न्यूजीलैंड जाने में पूरा दिन निकल जाता है। सीधी फ्लाइट्स शुरू होने से समय बचेगा। व्यापार बढ़ेगा।

खेती और डेयरी सेक्टर में जमीनी बदलाव

न्यूजीलैंड को दुनिया में डेयरी का किंग माना जाता है। उनके पास दूध उत्पादन और प्रोसेसिंग की बेहतरीन तकनीक है। भारत इस मामले में मात्रा में तो आगे है लेकिन तकनीक में पीछे है। अब दोनों देश मिलकर कृषि और डेयरी क्षेत्र में बड़ा सहयोग करने जा रहे हैं।

इसका सबसे बड़ा फायदा भारत के छोटे किसानों को मिलने वाला है। दोनों देशों ने 'कीवीफ्रूट एक्शन प्लान' तैयार किया है। इसके तहत भारत के नागालैंड और उत्तराखंड में दो सेंटर ऑफ एक्सीलेंस बनाए जाएंगे।

इन सेंटर्स में क्या होगा। यहां हमारे किसानों को न्यूजीलैंड की आधुनिक तकनीक से कीवी और अन्य फलों की खेती सिखाई जाएगी। उन्हें ट्रेनिंग मिलेगी। बेहतर बीज मिलेंगे। इससे पहाड़ों और उत्तर-पूर्व के किसानों की आमदनी सीधे दोगुनी हो सकती है। यह वो जमीनी बदलाव है जो इस रणनीतिक साझेदारी को सिर्फ बैठकों से निकालकर खेतों तक पहुंचाता है।

आतंकवाद और आपदा से निपटने का साझा फ्रंट

आज के दौर में कोई भी देश अकेले सुरक्षा की गारंटी नहीं ले सकता। आतंकवाद एक साझा दुश्मन है। भारत और न्यूजीलैंड ने अब इसके खिलाफ एक संयुक्त कार्य समूह बनाने का फैसला लिया है।

दोनों देशों की खुफिया एजेंसियां अब सीधे संपर्क में रहेंगी। संदिग्ध गतिविधियों और आतंकियों के नेटवर्क की जानकारी तुरंत साझा की जाएगी। पैसिफिक क्षेत्र में कट्टरपंथ को रोकने में यह सहयोग बहुत कारगर साबित होने वाला है।

इसके अलावा दोनों देशों ने प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए भी हाथ मिलाया है। भारत की नेशनल डिजास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी और न्यूजीलैंड की नेशनल इमरजेंसी मैनेजमेंट एजेंसी अब साथ मिलकर काम करेंगी। भूकंप, सुनामी और चक्रवात जैसी आपदाओं के दौरान दोनों देश एक-दूसरे की मदद करेंगे। तकनीक का आदान-प्रदान होगा। राहत कार्यों की ट्रेनिंग दी जाएगी।

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खेल और संस्कृति के जरिए दिलों को जोड़ना

भारत और न्यूजीलैंड के बीच भले ही 40 साल तक कोई बड़ी राजनीतिक हलचल न हुई हो, लेकिन क्रिकेट ने दोनों को हमेशा जोड़े रखा। केन विलियमसन और एमएस धोनी की दोस्ती को कौन भूल सकता है। अब इसी खेल वाले जुड़ाव को आधिकारिक रूप दिया जा रहा है।

दोनों देशों ने खेल सहयोग योजना को आगे बढ़ाने का फैसला किया है। इसके तहत हाई-परफॉर्मेंस स्पोर्ट्स, स्पोर्ट्स साइंस और स्पोर्ट्स मेडिसिन पर दोनों देश साथ काम करेंगे। भारतीय खिलाड़ियों को न्यूजीलैंड में ट्रेनिंग की आधुनिक सुविधाएं मिल सकेंगी।

गुजरात के लोथल में भारत एक भव्य नेशनल मैरिटाइम हेरिटेज कॉम्प्लेक्स बना रहा है। न्यूजीलैंड इस प्रोजेक्ट के विकास में भारत की मदद करेगा। दोनों देशों की प्राचीन समुद्री विरासत को दुनिया के सामने लाया जाएगा। यह दिखाता है कि यह साझेदारी सिर्फ आज की जरूरतों के लिए नहीं है, बल्कि यह हमारे इतिहास और संस्कृति को भी सम्मान दे रही है।

जमीनी स्तर पर आगे क्या करने की जरूरत है

अब जब समझौते हो चुके हैं, तो असली चुनौती इन्हें लागू करने की है। सरकारी फाइलें अक्सर धीमी चलती हैं। इस बार ऐसा नहीं होना चाहिए।

अगर आप एक बिजनेसर हैं या इस साझेदारी का फायदा उठाना चाहते हैं, तो आपको इनक्टिव नहीं बैठना चाहिए। कृषि, लॉजिस्टिक्स और डिजिटल तकनीक के क्षेत्र में नए स्टार्टअप्स के लिए यह बेहतरीन मौका है। न्यूजीलैंड के निवेशकों से संपर्क साधने और उनके तकनीकी ज्ञान का लाभ उठाने की तैयारी अभी से शुरू कर देनी चाहिए। दोनों देशों के मंत्रालयों को हर छह महीने में इन 18 समझौतों की प्रगति की समीक्षा करनी होगी ताकि कोई भी प्रोजेक्ट बीच में न लटके। इंडो-पैसिफिक का भविष्य अब बदल रहा है और भारत इसमें फ्रंट सीट पर बैठ चुका है।

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Ava Wang

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