ईरान के इस न्योते ने बढ़ाई दिल्ली की धड़कनें क्या खामेनेई के अंतिम संस्कार में जाएंगे पीएम मोदी

ईरान के इस न्योते ने बढ़ाई दिल्ली की धड़कनें क्या खामेनेई के अंतिम संस्कार में जाएंगे पीएम मोदी

ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत के बाद मध्य पूर्व का राजनीतिक समीकरण पूरी तरह बदल चुका है। अब इस भूचाल का असर सीधे भारत की विदेश नीति पर दिख रहा है। ईरान के राष्ट्रपति मससूद पेजेशकियन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को तेहरान आने का न्योता भेजा है। मौका है खामेनेई के अंतिम संस्कार का जो जुलाई के पहले हफ्ते में होने जा रहा है। ईमानदारी से कहें तो इस एक चिट्ठी ने साऊथ ब्लॉक में अधिकारियों की रात की नींद उड़ा दी है। भारत के सामने अब एक ऐसी कूटनीतिक दीवार खड़ी हो गई है जिसके दोनों तरफ खाई है।

इस समय दुनिया दो धड़ों में बंटी हुई है। एक तरफ अमेरिका और इजरायल हैं जिन्होंने फरवरी में इस हमले को अंजाम दिया। दूसरी तरफ ईरान और उसका पूरा नेटवर्क है। ऐसे में पीएम मोदी का ईरान जाना या न जाना केवल एक यात्रा का फैसला नहीं है। यह इस बात का संकेत होगा कि भारत आने वाले वक्त में वैश्विक राजनीति में खुद को कहां देखता है।

इस न्योते ने क्यों बढ़ाई भारत की मुश्किलें

ईरान के साथ भारत के रिश्ते हमेशा से खास रहे हैं। चाबहार पोर्ट से लेकर ऊर्जा सुरक्षा तक दोनों देश एक-दूसरे की जरूरत हैं। लेकिन इस बार मामला अलग है। खामेनेई की मौत कोई सामान्य घटना नहीं थी बल्कि यह एक अमेरिकी और इजरायली हमला था। इस वजह से तेहरान में होने जा रहा यह अंतिम संस्कार महज एक शोक सभा नहीं बल्कि एक बड़ा राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन बनने जा रहा है।

अगर पीएम मोदी इस कार्यक्रम में शामिल होते हैं तो वाशिंगटन और तेल अवीव में इसका बहुत बुरा संदेश जाएगा। भारत और इजरायल के बीच रक्षा और तकनीक को लेकर जो गहरी साझेदारी है उस पर सीधा असर पड़ सकता है। अमेरिका के साथ भारत के व्यापारिक और रणनीतिक रिश्ते दांव पर लग जाएंगे।

दूसरी तरफ अगर भारत इस न्योते को पूरी तरह ठुकरा देता है तो ईरान इसे एक झटके के रूप में देखेगा। चाबहार बंदरगाह के जरिए भारत जो मध्य एशिया तक अपनी पहुंच बनाना चाहता है उस पूरे प्रोजेक्ट पर पानी फिर सकता है। ईरान के साथ रिश्तों में आई कड़वाहट का फायदा सीधे तौर पर चीन उठाने के लिए तैयार बैठा है। चीन हमेशा से ऐसे मौकों की तलाश में रहता है जहां भारत थोड़ा भी पीछे हटे और वह अपनी जगह बना ले।

विदेश मंत्रालय के पास क्या हैं विकल्प

भारतीय कूटनीति हमेशा से बीच का रास्ता निकालने के लिए जानी जाती है। इस बार भी कुछ ऐसा ही देखने को मिल सकता है। कूटनीतिक गलियारों में चर्चा है कि पीएम मोदी खुद जाने के बजाय किसी वरिष्ठ मंत्री या उपराष्ट्रपति को भारत के प्रतिनिधि के रूप में भेज सकते हैं।

याद करिए जब 2024 में ईरान के राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी की एक हेलीकॉप्टर दुर्घटना में मौत हुई थी तब भारत ने तत्कालीन उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ को भेजा था। यह एक ऐसा तरीका है जिससे ईरान का सम्मान भी रह जाता है और पश्चिमी देशों को भी यह कहने का मौका नहीं मिलता कि भारत सीधे तौर पर उनके दुश्मनों के साथ खड़ा है।

लेकिन इस बार चुनौती कहीं बड़ी है। खामेनेई का कद रईसी से बहुत बड़ा था। वह तीन दशकों से अधिक समय से ईरान के सर्वोच्च नेता थे। ईरान उम्मीद कर रहा है कि उसके इस संकट के समय में भारत के शीर्ष नेतृत्व की मौजूदगी दिखे।

पहले से तय विदेशी दौरे बन सकते हैं ढाल

पीएम मोदी का जुलाई का शेड्यूल पहले से ही काफी व्यस्त है। उन्हें 6 से 11 जुलाई के बीच इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड की यात्रा पर जाना है। दिलचस्प बात यह है कि ईरान में खामेनेई के अंतिम संस्कार के मुख्य कार्यक्रम भी 5 से 9 जुलाई के बीच अलग-अलग शहरों जैसे तेहरान, कौम और मशहद में होने वाले हैं।

यह पूर्व निर्धारित दौरा भारत के लिए एक बेहतरीन कूटनीतिक ढाल साबित हो सकता है। भारत बेहद सम्मानजनक तरीके से ईरान को बता सकता है कि प्रधानमंत्री की पहले से तय अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताएं हैं जिसके कारण उनका व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होना मुमकिन नहीं है। कूटनीति में समय का ऐसा टकराव अक्सर बड़े संकटों को टालने का काम करता है।

इसके बावजूद ईरान भारत पर दबाव बनाने की कोशिश छोड़ नहीं रहा है। अंतिम संस्कार के कार्यक्रम की घोषणा के तुरंत बाद ईरान के तेल मंत्री मोहसेन पाकनेजाद नई दिल्ली पहुंचे हैं। वे ब्रिक्स देशों की ऊर्जा बैठक में हिस्सा लेने आए हैं लेकिन पर्दे के पीछे असली मकसद भारत के साथ ऊर्जा कूटनीति को मजबूत करना और अंतिम संस्कार के न्योते पर बात करना है।

चाबहार और चीन का त्रिकोण

भारत के लिए ईरान का मतलब केवल कच्चा तेल नहीं है। भारत ने हाल ही में चाबहार बंदरगाह के संचालन के लिए ईरान के साथ 10 साल का एक बड़ा समझौता किया है। यह बंदरगाह भारत को पाकिस्तान को दरकिनार करते हुए अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंचने का सीधा रास्ता देता है।

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अगर भारत ईरान के इस न्योते पर बहुत ठंडा रुख अपनाता है तो चाबहार प्रोजेक्ट खटाई में पड़ सकता है। ईरान इस प्रोजेक्ट को धीमा कर सकता है या फिर इसमें चीनी निवेश को बढ़ावा दे सकता है। चीन पहले से ही ईरान के बुनियादी ढांचे में अरबों डॉलर लगाने का वादा कर चुका है।

भारत किसी भी कीमत पर यह नहीं चाहेगा कि उसके पड़ोस में चीन का प्रभाव और ज्यादा बढ़े। इसलिए भारतीय राजनयिकों को एक ऐसा संतुलन बनाना होगा जो चीन को मौका न दे और अमेरिका को नाराज भी न करे।

क्या कहता है पुराना इतिहास

भारत ने हमेशा रणनीतिक स्वायत्तता की नीति का पालन किया है। शीत युद्ध के जमाने से लेकर आज तक भारत किसी एक गुट का हिस्सा बनने से बचता रहा है। रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान भी हमने देखा कि कैसे भारत ने पश्चिमी देशों के भारी दबाव के बावजूद रूस से तेल खरीदना जारी रखा और यूक्रेन को मानवीय सहायता भी भेजी।

ईरान के मामले में भी भारत इसी नीति को दोहराना चाहेगा। भारत यह साफ करना चाहता है कि उसके रिश्ते किसी तीसरे देश की इच्छा से तय नहीं होते। लेकिन ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंधों और इजरायल के साथ सीधे युद्ध की स्थिति ने इस बार समीकरण को बहुत ज्यादा संवेदनशील बना दिया है।

आगे की राह और भारत का कदम

इस कूटनीतिक चक्रव्यूह से निकलने के लिए भारत को बेहद सधे हुए कदम उठाने होंगे। आने वाले दिनों में भारत निम्नलिखित कदम उठा सकता है जिस पर साउथ ब्लॉक में गंभीरता से विचार चल रहा है।

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भारत को तुरंत अपने एक अत्यंत उच्च स्तरीय और विश्वसनीय प्रतिनिधिमंडल के नाम की घोषणा करनी चाहिए जो तेहरान जाकर भारत की संवेदनाएं प्रकट करे। इस प्रतिनिधिमंडल में कैबिनेट रैंक के मंत्री या देश के शीर्ष संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्ति शामिल होने चाहिए ताकि ईरान को अपनी अहमियत का अहसास हो।

इसके साथ ही भारत को अमेरिका और इजरायल के नेतृत्व के साथ सीधे संपर्क में रहना होगा। उन्हें यह समझाना होगा कि भारत का ईरान में शामिल होना किसी राजनीतिक समर्थन का हिस्सा नहीं है बल्कि यह केवल दीर्घकालिक द्विपक्षीय हितों और क्षेत्रीय स्थिरता को बनाए रखने की एक कूटनीतिक मजबूरी है। चाबहार बंदरगाह की सुरक्षा और मध्य एशिया में स्थिरता खुद पश्चिमी देशों के हित में भी है क्योंकि यह चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव को टक्कर देता है।

भारत को अपनी ऊर्जा सुरक्षा को लेकर भी ईरान के साथ बातचीत जारी रखनी होगी। तेल मंत्री पाकनेजाद की दिल्ली यात्रा का पूरा फायदा उठाते हुए भारत को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि आने वाले समय में वैश्विक बाजार में उथल-पुथल के बावजूद भारत की तेल आपूर्ति प्रभावित न हो। कूटनीति भावनाओं से नहीं बल्कि ठोस राष्ट्रीय हितों से चलती है और भारत इस समय इसी सिद्धांत पर आगे बढ़ रहा है।

JR

John Reed

Drawing on years of industry experience, John Reed provides thoughtful commentary and well-sourced reporting on the issues that shape our world.