खामेनेई के जनाजे में 70 देशों का जुटना दुनिया को क्या संदेश देता है

खामेनेई के जनाजे में 70 देशों का जुटना दुनिया को क्या संदेश देता है

ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की अंतिम विदाई सिर्फ एक शोक सभा नहीं है। यह असल में मध्य पूर्व की बदलती भू-राजनीति का एक बड़ा शक्ति प्रदर्शन है। तेहरान के ग्रैंड मोसल्ला में उमड़ा जनसैलाब और वहां मौजूद दुनिया के 70 से ज्यादा देशों के प्रतिनिधि इसी बात की गवाही दे रहे हैं। पश्चिमी देशों के कड़े प्रतिबंधों और दबाव के बावजूद इतनी बड़ी संख्या में अंतरराष्ट्रीय डेलीगेट्स का पहुंचना दिखाता है कि ईरान को वैश्विक पटल पर अलग-थलग करना इतना आसान नहीं है।

भारत ने भी इस मौके पर अपनी राजनयिक परिपक्वता दिखाई है। नई दिल्ली ने अपने हितों और द्विपक्षीय संबंधों को ध्यान में रखते हुए तेहरान में एक उच्च स्तरीय प्रतिनिधिमंडल भेजा। इसमें विदेश राज्य मंत्री पबित्र मार्गेरिटा और बिहार के राज्यपाल सैयद अता हसनैन शामिल हुए। भारत की यह मौजूदगी पश्चिम एशिया में उसके रणनीतिक संतुलन को साफ बयां करती है।


तेहरान में दुनिया का जमावड़ा और इसके मायने

ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची ने सोशल मीडिया पर इस अंतरराष्ट्रीय एकजुटता के लिए खुलकर आभार जताया। उन्होंने खास तौर पर अरब देशों के प्रतिनिधियों की मौजूदगी को रेखांकित किया। सऊदी अरब, कतर, ओमान और इराक जैसे देशों के नेताओं का एक साथ तेहरान में होना इस बात का सबूत है कि क्षेत्रीय समीकरण बदल रहे हैं। कुछ साल पहले तक जिन देशों के बीच भारी तनाव था, वे आज एक मंच पर खड़े दिख रहे हैं।

जनाजे में शामिल प्रमुख वैश्विक चेहरों पर नजर डालें तो इसमें पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर, इराक के राष्ट्रपति निज़ार आमेदी, आर्मेनिया के प्रधानमंत्री निकोल पाशिन्यान और ताजिकिस्तान के राष्ट्रपति इमोमाली रहमोन जैसे कद्दावर नाम शामिल हैं। इसके अलावा रूस, चीन और तुर्की ने भी अपने उच्च स्तरीय प्रतिनिधि भेजकर ईरान के साथ अपने मजबूत होते रिश्तों का संदेश दिया है।

पश्चिमी देश लगातार ईरान पर दबाव बनाने की कोशिश करते रहे हैं। वे उसे वैश्विक अर्थव्यवस्था और कूटनीति से काटना चाहते हैं। लेकिन 70 से ज्यादा देशों का यह जुटना साफ करता है कि दुनिया अब केवल एकतरफा पश्चिमी नैरेटिव पर नहीं चलती। गैर-पश्चिमी ब्लॉक तेजी से मजबूत हो रहा है।


भारत का रणनीतिक कदम

भारत और ईरान के रिश्ते सदियों पुराने सांस्कृतिक और व्यापारिक धागों से बंधे हैं। चाबहार बंदरगाह जैसी रणनीतिक परियोजनाएं भारत के लिए मध्य एशिया और रूस तक पहुंचने का एक बेहद जरूरी रास्ता हैं। ऐसे में ईरान के शीर्ष नेतृत्व के इस संकट के समय भारत का वहां खड़े होना उसकी दीर्घकालिक विदेश नीति का हिस्सा है।

राजनयिक हलकों में भारत के इस कदम को बहुत बारीकी से देखा जा रहा है। भारत एक तरफ अमेरिका और इजरायल के साथ अपने करीबी रणनीतिक संबंध बनाए रखता है, तो दूसरी तरफ ईरान के साथ अपने पारंपरिक और आर्थिक हितों से समझौता नहीं करता। विदेश राज्य मंत्री पबित्र मार्गेरिटा और सैन्य पृष्ठभूमि से आने वाले राज्यपाल सैयद अता हसनैन को भेजना दिखाता है कि भारत इस संबंध को कितनी गंभीरता से लेता है। यह कदम दोनों देशों के बीच भविष्य के सहयोग को जारी रखने का एक मजबूत संकेत है।

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एक हफ्ते तक चलने वाला अंतिम सफर

अयातुल्ला अली खामेनेई का यह अंतिम सफर बेहद भव्य और कड़े सुरक्षा इंतजामों के बीच हो रहा है। ईरानी सरकारी मीडिया के मुताबिक, तेहरान के ग्रैंड मोसल्ला में आम जनता और विदेशी मेहमानों के दर्शन के बाद सोमवार को एक विशाल शव यात्रा निकाली जा रही है।

इसके बाद के कार्यक्रम कुछ इस तरह तय किए गए हैं:

  • मंगलवार: शव को पवित्र शहर कोम ले जाया जाएगा, जो शिया धार्मिक शिक्षा का एक बड़ा केंद्र है।
  • बुधवार: इस काफिले को इराक के पवित्र शहरों नजफ और कर्बला ले जाया जाएगा, जहां विशेष धार्मिक अनुष्ठान होंगे।
  • गुरुवार (9 जुलाई): अंतिम संस्कार की रस्में पूर्वोत्तर शहर मशहद में समाप्त होंगी, जहां उन्हें इमाम रजा दरगाह में सुपुर्द-ए-खाक किया जाएगा।

ईरानी प्रशासन को उम्मीद है कि इस पूरी प्रक्रिया के दौरान देश भर में करोड़ों लोग सड़कों पर उतरेंगे। सुरक्षा एजेंसियां बेहद सतर्क हैं क्योंकि क्षेत्र में तनाव पहले से ही चरम पर है। सैन्य अधिकारियों ने साफ चेतावनी दी है कि इस शोक के समय ईरान को निशाना बनाने की किसी भी कोशिश का बेहद कड़ा और तुरंत जवाब दिया जाएगा।


आगे क्या होगा

खामेनेई के जाने के बाद अब सबकी नजरें ईरान के आंतरिक राजनीतिक बदलावों पर टिकी हैं। क्या ईरान अपनी सख्त पश्चिमी-विरोधी नीतियों पर कायम रहेगा या नए नेतृत्व के तहत कुछ बदलाव देखने को मिलेंगे? फिलहाल, तेहरान से जो तस्वीरें आ रही हैं, वे निरंतरता और प्रतिरोध का ही संदेश दे रही हैं।

ग्लोबल डिप्लोमेसी में दिलचस्पी रखने वालों के लिए आने वाले कुछ हफ्ते बेहद महत्वपूर्ण होने वाले हैं। चाबहार पोर्ट के काम की रफ्तार और भारत-ईरान के बीच व्यापारिक समझौतों की प्रगति पर इसका सीधा असर देखने को मिल सकता है। भारत को अपने हितों की रक्षा के लिए ईरान के नए सत्ता केंद्र के साथ लगातार संवाद बनाए रखना होगा। पश्चिम एशिया के इस नए घटनाक्रम पर बारीक नजर रखना हर अंतरराष्ट्रीय विश्लेषक के लिए अब जरूरी हो गया है।

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Ava Wang

A dedicated content strategist and editor, Ava Wang brings clarity and depth to complex topics. Committed to informing readers with accuracy and insight.